निकटस्थ स्थल

सारनाथ

वाराणसी से 10 किमी दूर सारनाथ वह जगह है जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपना पहला धर्मोपदेश “महा-धर्म-चक्र प्रवर्तन” का प्रचार किया। सरनाथ, बौद्ध पुराणों में से एक सबसे समृद्ध है, जो कि सम्राट अशोक के काल से 12 वी सदी के मध्य धर्मराजिका स्तूप को यहां बनाया गया था और इसके चारों ओर सिंह मुखाकृति युक्त चार स्तंभों की अनुपम मूर्ति को स्थापित किया था। यह चक्र युक्त अशोक स्तम्भ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह है। सारनाथ में अन्य संरचनाओं में मुगल-गंध कुटी का प्रतिनिधित्व करते हुए ईंट मंदिर के अवशेष, स्तूप और मठों के खंडहर भी विद्यमान हैं। यहाँ पर महत्वपूर्ण धम्मेख स्तूप है, जो निचले हिस्से में नाजुक फूलों की नक्काशीयों से युक्त है. चौखंडी स्तूप और महाबोधी सोसाइटी की मुल्गंध कुटी विहार मंदिर भी दर्शनीय हैं । सारनाथ ने बुद्ध काल एवं बोधिसत्व छवियों के बौद्ध मूर्तियों का एक बहुत समृद्ध संग्रह भी है, जिसे पुरातत्व संग्रहालय, सारनाथ में देखा जा सकता है।

रामनगर

वाराणसी से 14 किमी रामनगर किले में काशी नरेश राजवंश का संग्रह प्रदर्शित करने वाला एक संग्रहालय है जिसमें विंटेज कारें, रॉयल पालकियां, तल्वारोंन का एक शस्त्रागार और पुरानी बंदूकें, हाथीदांत का काम और प्राचीन घड़ियों शामिल हैं। वेद व्यास, दुर्गा मंदिर और छिनमस्तिका मंदिर भी रामनगर में स्थित हैं। रामनगर की रामलीला विश्वप्रसिद्ध है.

विंध्याचल

वाराणसी से 80 किलोमीटर की दुरी पर विन्ध्य पर्वत सृखला में माँ विंध्यवासिनी देवी, अष्टभुजा और कालीखोह के प्रमुख प्राचीन मन्दिर है।

चुनार दुर्ग

वाराणसी से चुनार किला 40 किमी दूर स्थित है। संत भरतिहारी ने किले के अंदर जीवित समाधि ली थी । चुनार के ऐतिहासिक किले को महान योद्धा-शासक शेर शाह सूरी के नाम से लिया गया है। सोनवा मंडप, सूर्य घड़ी और एक विशाल कवच किले के अंदर कुछ आकर्षण हैं। गंगा नदी के किनारे स्थित यह किला एक शानदार दृश्य प्रदान करता हैं। रात में ठहरने हेतु एक पीडब्लूडी रेस्ट हाउस हैं।

चन्द्रपभा वन्य अभ्यारण्य

वाराणसी से 70 किमी दूर चंद्रप्रभा,राजदारी और देवदारी झरने हैं। जो पिकनिक हेतु उपयुक्त एवं  दर्शनीय स्थल हैं।